योग भारत में एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। योग भारत से चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्री लंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत् में लोग इससे परिचित हैं।
इतनी प्रसिद्धि के बाद पहली बार ११ दिसंबर २०१४ को UN संयुक्त राष्ट्र महाशभा ने प्रत्येक बर्ष २१ जून को बिश्व योग दिवस के रूप में सम्पूर्ण बिश्व भर मनाने के लिये मान्यता दी है
प्राणायाम
- भस्त्रिका प्राणायाम
- कपालभाति प्राणायाम
- अनुलोम विलोम प्राणायाम
- भ्रामरी प्राणायाम
- ओम
आसन
- कन्द्रासन
- कमर कन्द्रासन
- अर्ध हलासन
- नौकासन
- क्रंचेस
- पादसंचालन ( सर्किल एंड साइकिलिंग)
- भुजंगासन
- अर्ध भुजंगासन
- सलभसान
- धनुरासन
प्राणायाम
भस्त्रिका प्राणायाम
भस्त्रिका प्राणायाम की विधि
- पद्मासन या सुखासन में बैठे। मेरुदंड, पीठ, गला तथा सिर को सीधा रखे और अपने शरीर को बिलकुल स्थिर रखे।
- मुंह बंद रखे।
- इसके बाद दोनों नासिका छिद्रों (Nostrils) से आवाज करते हुए श्वास लेना है और आवाज करते हुए श्वास बाहर छोड़ना हैं।
- श्वास लेने और छोड़ने की गति तीव्र होना चाहिए।
- इस तरह कम से कम 20 बार करना हैं।
- भस्त्रिका प्राणायाम करते समय आंखरी क्रिया / श्वास में श्वास अन्दर लेते समय छाती, पेट और फेफड़ो का पूर्ण विस्तार करे और श्वास को अन्दर रखे।
- भस्त्रिका प्राणायाम करते समय श्वास लेने और छोड़ने का समय समान रखे।
भस्त्रिका प्राणायाम के लाभ
- शरीर के सभी अंगो को रक्त संचार में सुधार होता हैं।
- अस्थमा / दमा, टीबी और कर्करोग के रोगियो में लाभ होता हैं।
- फेफड़ो की कार्यक्षमता बढती हैं।
- शरीर में प्राणवायु (Oxygen) की मात्रा संतुलित रहती हैं।
- पेट का उपयोग अधिक होने से पेट के अंग मजबूत होते है और पाचन शक्ति में वृध्दि होती हैं।
- वजन कम करने और पेट की चर्बी कम करने में सहायक हैं।
- शरीर, मन और प्राण को स्फूर्ति मिलती हैं।
भस्त्रिका प्राणायाम में क्या सावधानी बरते ?
निचे दिए हुए व्यक्तिओ ने भस्त्रिका प्राणायाम नहीं करना चाहिए।
- उच्च रक्तचाप के रोगी
- ह्रदय रोग के रोगी
- गर्भवती महिलाए
- अल्सर के रोगी
- मिरगी के रोगी
- पथरी के रोगी
- मस्तिष्क आघात / Stroke के रोगी
- गर्मी के दिनों यह सिर्फ सुबह के समय ही करे और सामान्य से कम चक्र करना चाहिए।
- अच्छे परिणामो के लिए यह प्राणायाम साफ़ और खुली हवा में करना चाहिए।
- भस्त्रिका प्राणायाम करते समय शुरुआत में कम समय के लिए करे और धीरे-धीरे अभ्यास का समय और चक्र बढ़ाये।
भस्त्रिका प्राणायाम यह एक बहु उपयोगी प्राणायाम हैं। भस्त्रिका प्राणायाम करते समय चक्कर आना, जी मचलना, घबराहट होना या बैचेनी होना जैसे कोई लक्षण नजर आने पर प्राणायाम तुरंत बंद कर देना चाहिए और डॉक्टर या योग विशेषज्ञ की सलाह लेना चाहिए। वात, पित्त और कफ इन त्रिदोषो की अशुद्धि और मन को काबू में पाने के लिए यह उत्तम प्राणायाम हैं।
कपालभाती प्राणायाम
'कपालभाती' यह एक संस्कृत शब्द है। 'कपाल' का मतलब होता है माथा / Forehead और 'भाती' का मतलब होता है प्रकाश / Light। रोज नियमित कपालभाती करने से व्यक्ति का माथा / चेहरे पर कांती या चमक आती है। चेहरे पर चमक होना स्वस्थ और निरोगी व्यक्ति की पहचान होती है। कपालभाती यह एक प्राणायाम का चमत्कारी प्रकार है जिसके कई सारे फायदे है।
विधि / Procedure
- आप सिद्धासन, पदमासन या वज्रासन में बैठ सकते है। आप चाहे तो आपको जो आसन आसान लगे या आप हमेशा जैसे निचे जमीन पर बैठते है उस तरह बैठ जाए।
- बैठने के बाद अपने पेट को ढीला छोड़ दे।
- अब अपने नाक से सांस को बाहर छोड़ने की क्रिया करे। सांस को बाहर छोड़ते समय पेट को अंदर की ओर धक्का दे।
- श्वास अंदर लेने की क्रिया करने की जरुरत नहीं है। इस क्रिया में श्वास अपने आप अंदर लिया जाता है।
- लगातार जितने समय तक आप आसानी से कर सकते है तब तक नाक से श्वास बाहर छोड़ने और पेट को अंदर धक्का देने की क्रिया को करते रहे।
- शुरुआत में 10 बार और धीरे धीरे बढ़ाते हुए एक बार में 60 बार तक यह क्रिया करे।
सावधानिया / Precautions
- कपालभाती सुबह के समय खाली पेट, पेट साफ़ होने के बाद ही करे।
- अगर खाना खाने के बाद कपालभाती करना है तो खाने के 5 घंटे बाद इसे करे।
- कपालभाती करने के बाद 30 मिनिट तक कुछ न खाए। आप चाहे तो थोड़ा पानी ले सकते है।
- शुरुआत में कपालभाती किसी योगा के जानकार के देखरेख में ही करे।
- गर्भवती महिला, Gastric ulcer, Epilepsy, Hernia के रोगी इस क्रिया को न करे।
- Hypertension / उच्चरक्तचाप और ह्रदय रोगी अपने डॉक्टर की सलाह लेकर हे इस क्रिया को करे।
- ऐसे तो कपालभाती क्रिया के कोई दुष्परिणाम / side-effects नहीं है फिर भी कपालभाती करते वक्त चक्कर आना या जी मचलाना जैसी कोई परेशानी होने पर अपने डॉक्टर से संपर्क करे।
लाभ / Benefits
- वजन कम / weight loss होता है। भारत में ऐसे कई लोग है जिन्होंने कपालभाती से अपना 30 से 40 किलो वजन काम किया है।
- पेट की बढ़ी हुई अतिरिक्त चर्बी कम होने में सहायक है। यह आपके कमर के आकार को फिर से सामान्य आकार में लाने में मदद करता है।
- चेहरे की झुर्रिया और आँखों के निचे का कालापन दूर कर चेहरे की चमक फिर से लौटाने में मदद करता है।
- गैस, कब्ज और अम्लपित्त / Acidity की समस्या को दूर भगाता है।
- शरीर और मन के सारे नकारात्मक तत्व और विचारो को मिटा देता है।
- शरीर को detox करता है।
- स्मरणशक्ति को बढ़ाता है।
- कफ विकार नष्ट होते है और श्वासनली की सफाई अच्छे से होती है।
- इस क्रिया से रक्त धमनी की कार्यक्षमता बढाती है और बढ़ा हुआ cholesterol को काम करने में मदद होती है।
- कपालभाती करने वक्त पसीना अधिक आता है जिससे शरीर स्वच्छ होता है।
अनुलोम-विलोम प्राणायाम
अनुलोम का अर्थ होता है सीधा और विलोम का अर्थ है उल्टा। यहां पर सीधा का अर्थ है नासिका या नाक का दाहिना छिद्र और उल्टा का अर्थ है-नाक का बायां छिद्र। अर्थात अनुलोम-विलोम प्राणायाम में नाक के दाएं छिद्र से सांस खींचते हैं, तो बायीं नाक के छिद्र से सांस बाहर निकालते है। इसी तरह यदि नाक के बाएं छिद्र से सांस खींचते है, तो नाक के दाहिने छिद्र से सांस को बाहर निकालते है। अनुलोम-विलोम प्राणायाम को कुछ योगीगण 'नाड़ी शोधक प्राणायाम' भी कहते है।
विधि
- अपनी सुविधानुसार पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन अथवा सुखासन में बैठ जाएं। दाहिने हाथ के अंगूठे से नासिका के दाएं छिद्र को बंद कर लें और नासिका के बाएं छिद्र से 4 तक की गिनती में सांस को भरे और फिर बायीं नासिका को अंगूठे के बगल वाली दो अंगुलियों से बंद कर दें। तत्पश्चात दाहिनी नासिका से अंगूठे को हटा दें और दायीं नासिका से सांस को बाहर निकालें।
- अब दायीं नासिका से ही सांस को 4 की गिनती तक भरे और दायीं नाक को बंद करके बायीं नासिका खोलकर सांस को 8 की गिनती में बाहर निकालें।
- इस प्राणायाम को 5 से 15 मिनट तक कर सकते है।
लाभ
-हमारे शरीर की ७२,७२,१०,२१० सुक्ष्मादी सुक्ष्म नाडी शुद्ध हो जाती है।
- हार्ट की ब्लाँकेज खुल जाते है।
- हाय, लो दोन्हो रक्त चाप ठिक हो जायेंगे|
- आर्थराटीस, रोमेटोर आर्थराटीस, कार्टीलेज घीसना ऐसी बीमारीओंको ठीक हो जाती है।
- टेढे लीगामेंटस सीधे हो जायेंगे|
- व्हेरीकोज व्हेनस ठीक हो जाती है।
- कोलेस्टाँल, टाँक्सीनस, आँस्कीडण्टस इसके जैसे विजतीय पदार्थ शरीर के बहार नीकल जाते है।
- सायकीक पेंशनट्स को फायदा होता है।
- सबसे बडा खतरनाक कँन्सर तक ठीक हो जाता है।
- सभी प्रकारकी अँलार्जीयाँ मीट जाती है।
- मेमरी बढाने की लीये|
- सर्दी, खाँसी, नाक, गला ठीक हो जाता है।
- ब्रेन ट्युमर भी ठीक हो जाता है।
- सभी प्रकार के चर्म समस्या मीट जाती है।
- मस्तिषक के सम्बधित सभि व्याधिओको मीटा ने के लिये|
- पर्किनसन, प्यारालेसिस, लुलापन इत्यादी स्नयुओ के सम्बधित सभि व्याधिओको मीटा ने के लिये|
भ्रामरी प्राणायाम
आजकल की दौड़-भाग और तनाव की जिंदगी में दिमाग और मन को शांत कर चिंता, भय, शोक, इर्ष्या और मनोरोग को दूर भगाने के लिए योग और प्राणायाम से अच्छी कोई और चीज नहीं हैं। मानसिक तनाव और विचारो को काबू में करने के लिए भ्रामरी प्राणायाम किया जाता हैं। भ्रामरी प्राणायाम करते समय भ्रमर (काले भँवरे) के समान आवाज होने के कारण इसे अंग्रेजी में Humming Bee Breath भी कहा जाता हैं। यह प्राणायाम हम किसी भी समय कर सकते हैं। खुर्ची पर सीधे बैठ कर या सोते समय लेटते हुए भी यह किया जा सकता हैं।
भ्रामरी प्राणायाम की अधिक जानकारी निचे दी गयी हैं :
भ्रामरी प्राणायाम की विधि
- सबसे पहले एक स्वच्छ और समतल जगह पर दरी / चटाई बिछाकर बैठ जाए।
- पद्मासन या सुखासन में बैठे।
- अब दोनों हाथो को बगल में अपने कंधो के समांतर फैलाए।
- दोनों हाथो को कुहनियो (Elbow) से मोडकर हाथ को कानों के पास ले जाए।
- अब अपनी दोनों हाथों के अंगूठो (Thumb) से दोनों कानों को बंद कर लें।
- अब दोनों हाथो की तर्जनी (Index) उंगली को माथे पर और मध्यमा (middle), अनामिका (Middle) और कनिष्का (Little) उंगली को आँखों के ऊपर रखना हैं।
- कमर, पीठ, गर्दन तथा सिर को सिधा और स्थिर रखे।
- अब नाक से श्वास अंदर लें। (पूरक)
- नाक से श्वास बाहर छोड़े। (रेचक)
- श्वास बाहर छोड़ते समय कंठ से भ्रमर के समान आवाज करना हैं। यह आवाज पूर्ण श्वास छोड़ने तक करना है और आवाज आखिर तक समान होना चाहिए।
- श्वास अंदर लेने का समय 10 सेकंड तक होना चाहिए और बाहर छोड़ने का समय 20 से 30 सेकंड तक होना चाहिए।
- शुरुआत में 5 मिनिट तक करे और अभ्यास के साथ समय बढ़ाये।
- भ्रामरी प्राणायाम करते समय आप सिर्फ तर्जनी उंगली से दोनों कान बंद कर बाकि उंगली की हल्की मुट्ठी बनाकर भी अभ्यास कर सकते हैं।
- आप चाहे तो शरुआत में बिना कान बंद किये भी यह प्राणायाम कर सकते हैं।
- शन्मुखी मुद्रा - अंगूठे से दोनों कान बंद करना। तर्जनी उंगली को हल्के से आँखों के ऊपर आँखों के नाक के पासवाले हिस्से तक रखना हैं। मध्यमा उंगली को नाक के पास रखना हैं। अनामिका उंगली को होंटो (lips) के ऊपर और और कनिष्का उंगली को होंटो के निचे रखना हैं। इस मुद्रा में भी भ्रामरी प्राणायाम किया जा सकता हैं।
भ्रामरी प्राणायाम के लाभ
भ्रामरी प्राणायाम से निचे दिए हुए लाभ होते है :
- क्रोध, चिंता, भय, तनाव और अनिद्रा इत्यादि मानसिक विकारो को दूर करने में मदद मिलती हैं।
- मन और मस्तिष्क को शांति मिलती हैं।
- सकारात्मक सोच बढ़ती हैं।
- अर्धशिशी / Migraine से पीडितो के लिए लाभकारी हैं।
- बुद्धि तेज होती हैं।
- स्मरणशक्ति बढ़ती हैं।
- उच्च रक्तचाप को के रोगियों के लिए उपयोगी हैं।
- भ्रामरी प्राणायाम करते समय ठुड्डी (Chin) को गले से लगाकर (जालंदर बंध) करने से थाइरोइड रोग में लाभ होता हैं।
- Sinusitis के रोगियों को इससे राहत मिलती हैं।
भ्रामरी प्राणायाम में क्या एहतियात बरतने चाहिए ?
- कान में दर्द या संक्रमण होने पर यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए।
- अपने क्षमता से ज्यादा करने का प्रयास न करे।
- प्राणायाम करने का समय और चक्र धीरे-धीरे बढ़ाये।
भ्रामरी प्राणायाम करने के बाद आप धीरे-धीरे नियमति सामान्य श्वसन कर श्वास को नियंत्रित कर सकते हैं। भ्रामरी प्राणायाम करते समय चक्कर आना, घबराहट होना, खांसी आना, सिरदर्द या अन्य कोई परेशानी होने पर प्राणायाम रोककर अपने डॉक्टर या योग विशेषज्ञ की सलाह लेना चाहिए।
उद्गीथ प्राणायाम
अन्य नाम –जाप सांस, ॐ उच्चारण
उच्चारण की विधि : प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।
ॐ के उच्चारण से शारीरिक लाभ
- अनेक बार ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।
- अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।
- यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।
- यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।
- इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।
- थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।
- नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी।
- ॐ के पहले शब्द का उच्चारण करने से कंपन पैदा होती है। इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।
- ॐ के दूसरे शब्द का उच्चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो कि थायरायड ग्रंथी पर प्रभाव डालता है।
आसन
कन्द्रासन 
यह रीढ़ की हड्डी को मजबूत और लचीला बनाने की लिए एक श्रेष्ठ आसन हैं।
योग विधि
कन्द्रासन करते समय निचे दी हुई सावधानी बरतनी चाहिए :
- उच्च रक्तचाप (Hypertension), ह्रदय रोग, गर्भिणी, हर्निया, नेत्र दोष, जिनका कोई ऑपरेशन हुआ है या चक्कर (Vertigo), गर्दन या कमर के Spnodylitis से पीड़ित व्यक्ति ने यह आसन नहीं करना चाहिए।
कन्द्रासन के लाभ
- रीढ़ की हड्डी लचीली और मजबूत बनती हैं।
- थाइरोइड और टॉन्सिल के लिए भी बहोत भयदेमन्द आसन है
- यह पेट और कमर के स्नायु को मजबूत बनाता हैं।
- कन्धों की हड्डिया मजबूत बनती हैं।
- मोटापा काम करने और पेट पर जमी अतिरिक्त चर्बी कम करने में मदद मिलती हैं।
कमर चक्रासन
– लाभ –
- पीठ में दर्द और रीढ़ की हड्डी में विकृति के लिए बहुत मददगार है |
- यह सर्विकल स्पॉन्डिलाइटिस और स्लिप डिस्क में बहुत उपयोगी है।
- यह पेट में दर्द, गैस्ट्रिक समस्याओं, कब्ज और अपच के इलाज के लिए मदद करता है।
- रक्त परिसंचरण को बढ़ाता है और स्नायु संबंधी विकार ठीक हो जाते है।
- यह गुर्दे, अग्न्याशय, प्लीहा और यकृत के रूप में आंतरिक अंगों को सक्रिय करता है।
- मधुमेह और अस्थमा के मरीजों को लाभान्वित किया जा सकता है।
- यह कूल्हे और जोड़ों के दर्द के लिए फायदेमंद है।
- यह थकान, उनींदापन और तनाव से राहत दिलाता है। मन और शरीर को आराम करने में बहुत प्रभावी।
- यह उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए बोहोत फ़ायदेमंद है क्योंकि इससे श्वास और हृदय गति धीमी/शांत हो जाती है।
– सावधानी –
- गंभीर पीठ दर्द से पीड़ित लोगों को इस आसन से बचना चाहिए।
- हर्निया के मरीजों को विशेषज्ञ मार्गदर्शन के साथ अभ्यास करना चाहिए।
अर्ध हलासन (९० डिग्री )
अर्ध हलासन करने का सही तरीका
- पीठ के बल जमीन पर लेट जाएं। हथेलियां जमीन की ओर रहेंगी और जांधों के बगल में रहेंगी। ध्यान रखें उन्हें पैरों के नीचे न दबाएं।
- पैरों को आपस में मिला लें और धीरे धीरे उठाते हुए नब्बे डिग्री तक ले आएं।
- सांस की गति सामान्य रखें और इसी तरह से तीन मिनट तक ठहरने का अभ्यास करें।
- हाथों से ताकत न लें कमर और पेट की ताकत का इस्तेमाल करें। ।
vअर्ध हलासन को करने से क्या फायदा होता है
- आंतों को ताकतवर बनाता है। कब्ज के रोगियों को इसे करने से लाभ मिलता है।
- यह खाना पचाने की ताकत को बढ़ाता है और मोटापे से लड़ने में मदद करता है।
- जिन लोगों को गैस की दिक्कत है वो इस आसन का नियमित अभ्यास करें, आराम मिलता है।
- अगर नाभि टल गई तो दो से तीन मिनट तक इस आसन को करना चाहिए, नाभि अपनी जगह बैठ जाती है।
- कमर में दर्द रहता है तो इस आसन को बारी बारी एक एक पैर से करना चाहिए। कमर को ताकत मिलती है।
- इस आसन के नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डी और भीतर की मसल्स ताकतवर बनती हैं।
- पैरों का सो जाना और उनका झनझनाना कम हो जाता है।
सावधानी
गर्भवती महिलाए न करे
जिन्हे अल्सर और हर्निया की शिकायत है
जिन्हे कमर में दर्द है वो एक पैर से ही करे
दिल के मरीज भी एक पैर से ही करे
नौकासन 
लाभ
- यह रीढ़ को मजबूत और फेफड़ों को मजबूत बनाता है.
- यह रीढ़ को लचीला बनाता है.
- यह जिगर, अग्न्याशय और आंतों के कामकाज में मदद करता है.
- आंतों को ताकतवर बनाता है। कब्ज के रोगियों को इसे करने से लाभ मिलता है।
- यह खाना पचाने की ताकत को बढ़ाता है और मोटापे से लड़ने में मदद करता है।
- जिन लोगों को गैस की दिक्कत है वो इस आसन का नियमित अभ्यास करें, आराम मिलता है।
सावधानी
गर्भवती महिलाए न करे
जिन्हे अल्सर और हर्निया की शिकायत है
जिन्हे कमर में दर्द है वो एक पैर से ही करे
दिल के मरीज भी एक पैर से ही करे
क्रंचेस
लाभ
- यह रीढ़ को मजबूत और फेफड़ों को मजबूत बनाता है.
- यह रीढ़ को लचीला बनाता है.
- यह जिगर, अग्न्याशय और आंतों के कामकाज में मदद करता है.
- आंतों को ताकतवर बनाता है। कब्ज के रोगियों को इसे करने से लाभ मिलता है।
- यह खाना पचाने की ताकत को बढ़ाता है और मोटापे से लड़ने में मदद करता है।
- जिन लोगों को गैस की दिक्कत है वो इस आसन का नियमित अभ्यास करें, आराम मिलता है
सावधानी
गर्भवती महिलाए न करे
जिन्हे अल्सर और हर्निया की शिकायत है
जिन्हे कमर में दर्द है वो एक पैर से ही करे
दिल के मरीज भी एक पैर से ही करे
पादसंचालन ( सर्किल एंड साइकिलिंग)
लाभ
- आंतों को ताकतवर बनाता है। कब्ज के रोगियों को इसे करने से लाभ मिलता है।
- यह खाना पचाने की ताकत को बढ़ाता है और मोटापे से लड़ने में मदद करता है।
- जिन लोगों को गैस की दिक्कत है वो इस आसन का नियमित अभ्यास करें, आराम मिलता है।
- अगर नाभि टल गई तो दो से तीन मिनट तक इस आसन को करना चाहिए, नाभि अपनी जगह बैठ जाती है।
- कमर में दर्द रहता है तो इस आसन को बारी बारी एक एक पैर से करना चाहिए। कमर को ताकत मिलती है।
- इस आसन के नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डी और भीतर की मसल्स ताकतवर बनती हैं।
- पैरों का सो जाना और उनका झनझनाना कम हो जाता है।
सावधानी
गर्भवती महिलाए न करे
जिन्हे अल्सर और हर्निया की शिकायत है
जिन्हे कमर में दर्द है वो एक पैर से ही करे
दिल के मरीज भी एक पैर से ही करे
भुजंगासन
यह आसन करते समय शरीर का आकार फन उठाए हुए सर्प के समान होने के कारण इसे 'भुजंगासन' कहा जाता हैं। अंग्रेजी में इसे Cobra poseभी कहा जाता हैं। सूर्यनमस्कार करते समय क्रमांक 7 में यह आसन किया जाता हैं। पीठ के दर्द से पीड़ित व्यक्तिओ के लिए यह सबसे लाभकर आसन हैं
भुजंगासन से निम्नलिखित लाभ मिलता हैं :
- रीढ़ की हड्डी लचीली बनती हैं।
- गले में खराबी या दमा से पीड़ित व्यक्तिओ में भी यह आसन लाभकर हैं।
- पीठ की हड्डी मजबूत बनती हैं।
- उदर संबंधी रोग जैसे लिवर और किडनी रोग में लाभ मिलता हैं।
- कब्ज की शिकायत दूर होती हैं।
- पेट पर जमी अतिरिक्त चर्बी को दूर कर मोटापा दूर करने में मदद मिलती हैं।
- महिलाओ में प्रजनन और मासिक संबंधी समस्या में लाभ मिलता हैं।
भुजंगासन में निम्नलिखित सावधानी बरते :
- हर्निया और Hyperthyroidism से पीड़ित व्यक्तिओ ने यह आसन नहीं करना चाहिए।
- अत्यधिक पेट दर्द होने पर यह आसन न करे।
- पीछे की ओर अकस्मात सिर और पीठ को नहीं झुकाना चाहिए।
- यह आसन अपने क्षमता अनुसार ही करे।
इस आसन से आप अपने शरीर को लचीला और फुर्तीला बना सकते हैं। अगर आपको पहले से कोई रोग या समस्या हैं तो किसी भी नए व्यायाम या आसन को करते समय अपने डॉक्टर और योग विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लेना चाहिए।
अर्ध भुजंगासन
अर्ध भुजंगासन से निम्नलिखित लाभ मिलता हैं :
- रीढ़ की हड्डी लचीली बनती हैं।
- गले में खराबी या दमा से पीड़ित व्यक्तिओ में भी यह आसन लाभकर हैं।
- पीठ की हड्डी मजबूत बनती हैं।
- उदर संबंधी रोग जैसे लिवर और किडनी रोग में लाभ मिलता हैं।
- कब्ज की शिकायत दूर होती हैं।
- पेट पर जमी अतिरिक्त चर्बी को दूर कर मोटापा दूर करने में मदद मिलती हैं।
- महिलाओ में प्रजनन और मासिक संबंधी समस्या में लाभ मिलता हैं।
अर्ध भुजंगासन में निम्नलिखित सावधानी बरते :
- हर्निया और Hyperthyroidism से पीड़ित व्यक्तिओ ने यह आसन नहीं करना चाहिए।
- अत्यधिक पेट दर्द होने पर यह आसन न करे।
- पीछे की ओर अकस्मात सिर और पीठ को नहीं झुकाना चाहिए।
- यह आसन अपने क्षमता अनुसार ही करे।
शलभासन
शलभासन योग करते समय शरीर का आकार शलभ (Locust) किट की तरह होने के कारण इसे शलभासन या Locust pose कहा जाता हैं। कमर और पीठ के स्नायु मजबूत करने के लिए यह एक श्रेष्ठ आसन हैं। शलभासन की विधि और लाभ
शलभासन योग करते समय निचे दिए हुए एहतियात बरतने चाहिए :
- अपने क्षमता से अधिक समय तक यह आसन नहीं करना चाहिए।
- इस आसन का समय धीरे-धीरे अभ्यास के साथ बढ़ाना चाहिए।
- पेप्टिक अल्सर, हर्निया, आंत की बीमारी और ह्रदय रोग के रोगियों ने यह आसन नहीं करना चाहिए।
- मेरुदंड की समस्या होने पर डॉक्टर की राय लेकर ही यह आसन करे।
- गर्भिणी महिला या जिनका कुछ समय पहले कोई पेट का ऑपरेशन हुआ हैं उन्होंने यह आसन नही करना चाहिए।
शलभासन करने से निचे दिए हुए लाभ होते हैं :
- रीढ़ की हड्डी और कटी प्रदेश मजबूत होता हैं।
- साइटिका (गृध्रसी) से पीड़ित व्यक्तिओ के लिए विशेष लाभकारी हैं।
- कमर और पैरो को मजबूती मिलती हैं।
- गर्दन और कंधो के स्नायु को मजबूती प्राप्त होती हैं।
- पेट और कमर की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक हैं। वजन कम होने में मदद होती हैं।
- पाचन (Digestion) में सुधार होता हैं।
शलभासन का अभ्यास करते समय हम शुरुआत में दोनों पैरो की जगह एक पैर उठाकर भी आसन कर सकते हैं। क्रम से एक पैर बदल कर शलभासन करने की क्रिया को ' अर्ध शलभासन ' कहा जाता हैं। किसी भी योग को करते समय कोई कठिनाई होने पर योग विशेषज्ञ की सलाह लेना चाहिए।
धनुरासन
धनुरासन के लाभ
- पाचन प्रणाली मजबूत होती हैं।
- रीढ़ की हड्डी लचीली और मजबूत बनती हैं।
- मलबद्धता, अजीर्ण और पाचन से जुड़े विकार दूर होते हैं।
- धनुरासन करने से पेट की अतिरिक्त चर्बी कम होती हैं और मोटापा कम होता हैं।
- महिलाओं में यह आसन करने मासिक धर्म संबंधी विकार दूर करने में मदद मिलती हैं।
- पैर और कंधो के स्नायु मजबूत होते हैं
No comments:
Post a Comment