हृदय रोग हमारे संवय दवारा अर्जित कारणों से होते हैं। हृदय हमारे शरीर में रकत संरचन करवाने वाला एक पंप है जो 1 मिनट में 72 से 80 बार पूरे शरीर में रकत का क्षेपन करता है। ऐसे में हृदय का धयान रखना उसे निर्दोष व सवसथ बनाये रखना जिन रकतवाहिनीयों में रकत संरचन होता है उंनहें साफ - सुथरी बनाये रखना उनमें किसी प्रकार का जमाव (Deposition) न होने देना हमारा जरूरी कर्तवय है। प्रमातमा ने हमें इतनी उतकृषठ मशीन दी है लेकिन हम हैं कि इस सुंदर और अतुलनीय शरीर को लापरवाही से प्रयोग करते हैं। चाहे रहन - सहन हो जा खानपान और क्रिया - कलाप सभी में लापरवाह हैं। जिस कारण हृदय जैसे कोमल अंग असहनशील होकर रूषट हो जाते हैं। कभी - कभी जंनमजात शरीर संरचना में भी इस अंग के कुछ दोष पाये जाते हैं जिनकी चिकितसा न केवल सर्जरी (Surgery) से ही हो सकती है। यह आप्रेशन बड़े असपतालों मे ही कार्डियो थोरासिक सर्जन दवारा ही किया जाता है।
हृदय रोगों के कारण— निरंतर अधिक गर्म व गरिषठ भोजन करने, कषाय एंव कड़वे पदार्थों का सेवन, अतयधिक श्रम, हृदय परमानिक आघात,अतयधिक चिंता, आधारीय वेग (मल, मूत्र, छींक, आँसु) को रोकने से हृदय रोग उतपंन होते हैं। भूख के बिना भोजन करने से भी होता है। उपरोकत कारण धनाढय लोगों, बुदिजीवियों व राजनेताओं में अधिक पाये जाते हैं। इन कारणों से प्रकुपित वात, रस एवम रकत को प्रदूषित कर हृदय के रोग उतपंन होते हैं।
हृदय के रोगों के लक्षण— इसमें शरीर में पीलापन (Cynosis) शमावता तथा गालों में विशेष लालिमा (Malar Flush) का समावेश होता है। हिमोगलोबिन की कमी से (Cynosis) शयामवता आती है। इसकी प्रतिति विशेषत: होंठ, नासाग्रभाग, नाखूनों में विशेष होती है। इसका कारण रकत शिराओं में अवरोध का होना है।
मू्र्छा— यह लक्षण Cardiac Asthma (हृदयजंनय साँस रोग) में पाया जाता है।
जवर— Rheumatic Heart Desease (आमवात जनम हृदयशूल के लक्षण पाये जाते हैं।)
CHD (हृदयवाहिनी की धनास्रता) में वमन अरूचि हृदय शूल के लक्षण पाये जाते हैं।
हृदय रोगों के अंनय लक्षण— हृदय में खिंचावट, सूई चुभने जैसी तेज पीड़ा, हृदय में ऐसा दर्द मानों कोई चाकू से दो टुकड़े कर रहा हो या डंडे से मथ रहा हो।
लक्षण— हृचछूल (Angina Pectoris) और हृदयवाहिनी अवरोध (Coronary Thrombosis) दोनों में होता है। इसमें Heart Palpitation (हृदयकंप) एंव सतंभ (Heart Block) विशेष लक्षण हैं। अधिक पसीना, वयाकुलता, अमलपित कलेजे का दर्द के साथ जलन, मुख का सूखना जैसे लक्षण भी मिलते हैं। रकतचाप में वृदि भी मुखय लक्षण है। मोटापा भी मुखय लक्षण है।
आयुर्वेद के हृदय रोग के पथय— यदि हृदय रोगी नियम के अनुसार पथय पूर्वक रहे तो वह हृदय की बाईपास सर्जरी से बच सकता है।
सबसे पहले सभी प्रकार के वयसनों को तयाग दें। भोजन में घी, तेल का प्रयोग नगनय (Zero Fat Diet) होना चाहिए। उबली हुई घिया, तोरी,टिंडा, मूँग की दाल व सूखी रोटी ही लें। आटा भी गेहूँ, जौं, चना का मिला हुआ लें। दूध भी बंद करदें। प्रसाद के रूप में भी कोई मिठाई या घी की वसतुएं लेना ऐसे रोगी के लिये जहर है।
एकबार में भरपेट भोजन न करें, अपितु बार—बार थोड़ा—थोड़ा भोजन लें चाहे 4-5 बार ही खाना पड़े। प्रात:काल की सैर आवशयक है। पानी की अधिक से अधिक मात्रा लें, ताकि खून गाढा न हो और विजातीय पदार्थ मूत्र के दवारा विसर्जित होते रहें।
चिंता, शोक, भय, हानि, लाभ, यश का भार मन व मसतिषक पर कम रखें। भगवान का धयान व योग क्रियाओं को जहाँ तक संभव हो करें। दिन में बबुगोशा, अमरूद, खरबूजा, आलु बुखारा में से कोई एक फल अवशय लें। जलदी सोयें व जलदी जागें।
आयुर्वेद में निमन औषधियाँ हृदय रोगों के लिये हैं।
अर्जुनसिद दुगध।
अर्जुनारिषट।
अकीक पिषटी।
हृदयार्णव रस।
लक्षमीविलास रस।
लशुनादि वटी।
कसतूरी भैरव रस।
सवर्ण सूतसेखर रस।
उपरोकत औषधियों को किसी अछे चिकितसक की देखरेख में लेना चाहिये।

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